ग्वालियर में आवारा कुत्तों को लेकर सरकारी तंत्र का एक ऐसा "अजूबा" सामने आया है, जिसे देखकर गणित और विज्ञान दोनों ही अपना सिर पकड़ लें। शहर में घूमते खूंखार कुत्तों के झुंड और रोज अस्पतालों में पहुंच रहे मासूमों के बीच, दो सरकारी विभागों के आंकड़े एक-दूसरे का मज़ाक उड़ा रहे हैं।
इस गंभीर और हैरान करने वाली ज़मीनी हकीकत पर द एक्सपोज़ एक्सप्रेस की विशेष रिपोर्ट:
ग्वालियर में आवारा कुत्तों की समस्या पर सरकारी आंकड़ों में इतना बड़ा विरोधाभास है कि आम जनता तो क्या, कोई समझदार अधिकारी भी इसे न समझा पाए।
पशुपालन विभाग का दावा: पूरे ग्वालियर जिले में केवल 5,057 कुत्ते हैं।
नगर निगम का दावा: पिछले 13 महीनों में नगर निगम 5,500 कुत्तों की नसबंदी करवा चुका है।
बड़ा सवाल: जब पूरे जिले में कुल कुत्ते ही 5057 हैं, तो नगर निगम ने 5500 कुत्तों की नसबंदी कहाँ से कर दी? क्या नगर निगम ने हवा में नसबंदी कर दी या फिर फाइलों में आंकड़ों का खेल चल रहा है?
खौफनाक हकीकत: 13 महीने, 82 हजार से ज्यादा शिकार
अगर कुत्ते सिर्फ 5 हजार हैं, तो फिर शहर की सड़कों पर जो खौफ नाच रहा है, वो किसका है? सरकारी अस्पतालों के रिकॉर्ड इस रहस्यमयी आंकड़े की पोल खोलते हैं:
82,496 लोग: पिछले 13 महीनों में सरकारी अस्पतालों में एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने पहुंचे।
90 मरीज रोज: औसतन हर दिन ग्वालियर के सरकारी अस्पतालों में डॉग बाइट के शिकार लोग इलाज के लिए आ रहे हैं।
यह संख्या सिर्फ सरकारी अस्पतालों (जैसे पुराना JAH परिसर) की है। अगर निजी अस्पतालों और क्लीनिकों के आंकड़े जोड़ दिए जाएं, तो यह संख्या डेढ़ लाख पार कर जाएगी।
फाइलों में सिमटी योजनाएं: 1170 रुपये प्रति कुत्ता, फिर भी काम अधूरा
शहरवासियों को आवारा कुत्तों के आतंक से बचाने के लिए कागज़ों पर बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन ज़मीन पर सब 'सफ़ेद हाथी' साबित हो रहे हैं:
ठेके का खेल: नगर निगम ने इस बार डॉग नसबंदी का ठेका एनीमल क्योर एंड केयर संस्था को दिया है। संस्था को प्रति कुत्ता 1170 रुपये का भुगतान किया जा रहा है।
दावे बनाम हकीकत: बिरलानगर और लक्ष्मीगंज केंद्रों में प्रतिदिन 70 कुत्तों की नसबंदी की क्षमता बताई गई है, लेकिन यह लक्ष्य कभी पूरा नहीं हो पाता।
अधूरी योजनाएं: शहर में 5 शेल्टर होम और 3 एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर बनने थे, जो आज भी अधूरे लटके हैं।
अधिकारी बोले- 'ऑनलाइन जो है, वही सच है'
इस पूरे घालमेल पर जब पशुपालन विभाग के उपसंचालक डॉ. उमेश दांतरे से बात की गई, तो उन्होंने माना कि पशुगणना का आंकड़ा वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता। उनका कहना है कि गणना के दौरान आवारा कुत्तों की अलग से गिनती का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। यह काम दूसरे विभागों के सहयोग से हुआ और जो ऑनलाइन दिख रहा है, वही आधिकारिक रिकॉर्ड है।
द एक्सपोज़ एक्सप्रेस का सीधा सवाल:
अगर पशुगणना के आंकड़े गलत हैं और नसबंदी का टारगेट सिर्फ कागजों पर पूरा हो रहा है, तो जनता की जान की कीमत पर यह लापरवाही कब तक चलेगी? जब अस्पतालों में पैर रखने की जगह नहीं है, तो गलियों के ये हजारों 'स्ट्रीट डॉग' सरकारी रिकॉर्ड से बाहर क्यों हैं?
ब्यूरो रिपोर्ट, द एक्सपोज़ एक्सप्रेस, ग्वालियर।
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