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मेले में पटाखे बिक रहे या दुकानों का सौदा हो रहा? प्राइम लोकेशन को लेकर विवाद, वसूली के आरोपों से मचा हड़कंप

ग्वालियर आतिशबाजी मेले में वसूली का खेल! पक्के बिल की जगह सादा कागज, प्राइम लोकेशन की दुकान दूसरे को बेचने का आरोप; कमेटी के सचिव पर सवाल

**THE XPOSE EXPRESS | इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट**


ग्वालियर के आतिशबाजी मेले में इस बार पटाखों से ज्यादा चर्चा कथित वसूली और अनियमितताओं की है। दुकानों का आवंटन प्रशासन की निगरानी में होता है, लेकिन अब कमेटी के पदाधिकारियों और दुकानदारों के आरोपों ने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।



कमेटी के कोषाध्यक्ष पंकज जायसवाल ने सचिव एडवोकेट हरीश दीवान पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अन्य कमेटी सदस्यों और दुकानदारों ने भी कथित वसूली, भुगतान की रसीदों और दुकानों की लोकेशन को लेकर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि दुकानदारों से अलग-अलग मदों में पैसे लिए जाते हैं, लेकिन पक्के बिल की जगह सादे कागज पर हिसाब दिया जाता है।



इतना ही नहीं, एक दुकानदार को कथित तौर पर गुमराह कर उसकी प्राइम लोकेशन वाली दुकान किसी दूसरे व्यक्ति को बेचने का मामला भी सामने आया है। अब सवाल है कि प्रशासन की निगरानी में चलने वाले इस मेले में आखिर हो क्या रहा है?


 1. करीब 400 दुकानें आवंटित, फिर 150 दुकानें कहां गईं?


जानकारी के मुताबिक, मेले में लॉटरी सिस्टम से करीब 400 दुकानों का आवंटन किया जाता है, लेकिन लगभग 250 दुकानें ही लगती हैं। बाकी करीब 150 दुकानें क्यों नहीं लगाई जातीं, इसका स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया है।


क्या आवंटित और संचालित दुकानों का रिकॉर्ड तैयार होता है? खाली रहने वाली दुकानों का क्या होता है? प्रशासन को आवंटन सूची और वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।


2. पक्के बिल की जगह सादे कागज पर हिसाब!


दुकानदारों का आरोप है कि बिजली, लाइसेंस और अन्य व्यवस्थाओं के नाम पर रकम लेने के बाद उन्हें विधिवत बिल या रसीद के बजाय सादे कागज पर हिसाब दे दिया जाता है।


सवाल है कि रकम किस मद में ली जाती है, किसके पास जमा होती है और उसका हिसाब कहां दर्ज है? यदि शुल्क अधिकृत हैं, तो उनकी निर्धारित दर और भुगतान का प्रमाण भी उपलब्ध होना चाहिए।


पैसे की वसूली हो रही है, तो उसका पक्का हिसाब क्यों नहीं?** हालांकि, इसकी वास्तविकता भुगतान के दस्तावेजों और संबंधित पक्षों के जवाब से ही स्पष्ट होगी।


## 3. पांच से सात दिन की बिजली के ₹7,750 लेने का आरोप


आरोप है कि मेले में एक दुकान से पांच से सात दिनों की बिजली के नाम पर ₹7,750 तक लिए जा रहे हैं। दुकानदारों का कहना है कि उन्हें इसकी विधिवत रसीद नहीं मिलती और बिजली की खपत मापने के लिए मीटर भी नहीं लगाया जाता।


अगर मीटर नहीं है, तो खपत का आकलन कैसे होता है? यह रकम किस दर के आधार पर तय की गई और क्या इसका संबंध बिजली विभाग के निर्धारित शुल्क से है? कमेटी और बिजली विभाग को इसका स्पष्ट हिसाब देना चाहिए।


 4. लाइसेंस के नाम पर ₹1,200 की वसूली?


दुकानदारों ने आरोप लगाया है कि लाइसेंस जमा करने के नाम पर प्रति लाइसेंस ₹1,200 लिए जाते हैं, लेकिन उसकी रसीद नहीं दी जाती।


यह राशि किस नियम के तहत ली जा रही है? क्या इसके लिए कोई आधिकारिक आदेश है और पैसा किस खाते में जमा होता है? प्रशासन को इस शुल्क की वास्तविकता स्पष्ट करनी चाहिए।


## 5. प्राइम लोकेशन की दुकान दूसरे व्यक्ति को बेचने का आरोप


इस मामले में एक दुकानदार की प्राइम लोकेशन वाली दुकान को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आया है। आरोप है कि एडवोकेट हरीश दीवान ने दुकानदार को गुमराह कर उसकी दुकान किसी अन्य व्यक्ति को बेच दी।


प्राइम लोकेशन यानी ऐसी जगह, जहां ग्राहकों की आवाजाही अधिक रहती है और कारोबार की संभावनाएं बेहतर होती हैं।


सवाल है कि दुकान के बदले पैसे लिए गए थे या लोकेशन का कोई आश्वासन दिया गया था? दुकान दूसरे व्यक्ति को किस आधार पर दी गई? क्या मूल आवंटी की सहमति ली गई और क्या प्रशासन से अनुमति ली गई थी?


यदि दुकान लॉटरी से आवंटित हुई थी, तो उसके हस्तांतरण का नियम क्या है? इस मामले में आवंटन के दस्तावेज और संबंधित दुकानदार का बयान सामने आना जरूरी है, ताकि आरोपों की पुष्टि हो सके।


6. कमेटी सचिव हरीश दीवान पर गंभीर आरोप


कमेटी के कोषाध्यक्ष पंकज जायसवाल ने सचिव एडवोकेट हरीश दीवान पर कथित वसूली और अन्य अनियमितताओं को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। कमेटी के अन्य सदस्यों और दुकानदारों ने भी उनकी भूमिका पर सवाल उठाए हैं।


आरोपों के मुताबिक, दुकानदारों से अलग-अलग मदों में रकम एकत्रित की जाती है और प्राइम लोकेशन वाली दुकान दूसरे व्यक्ति को दिए जाने का मामला भी सामने आया है।


अब सवाल है कि सचिव के पास रकम एकत्रित करने और दुकान आवंटन या लोकेशन बदलने के क्या अधिकार हैं? क्या इन लेन-देन का रिकॉर्ड कमेटी के पास है? इन सवालों का जवाब कमेटी के नियमों और वित्तीय दस्तावेजों से ही मिल सकता है।


 7. कमेटी में विवाद, दोबारा चुनाव कराने की मांग


जानकारी के मुताबिक, हरीश दीवान और कोषाध्यक्ष पंकज जायसवाल के बीच विवाद हुआ है। बताया जा रहा है कि मामला मारपीट और थाने तक पहुंच गया था। इस घटनाक्रम की पुष्टि पुलिस रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के बयानों से की जानी चाहिए।


कमेटी के कुछ सदस्यों ने दोबारा चुनाव कराने और मौजूदा कमेटी को भंग करने की मांग भी की है।


जब कमेटी के पदाधिकारी ही एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, तो आर्थिक लेन-देन की निगरानी कौन कर रहा है? क्या कमेटी के हिसाब-किताब का ऑडिट होता है? पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।


 8. प्रशासन से सवाल, एसडीएम का जवाब संतोषजनक नहीं


द एक्सपोज एक्सप्रेस ने मामले में जिला प्रशासन का पक्ष जानने का प्रयास किया। एसडीएम से भी सवाल किए गए, लेकिन उनकी ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिल सका।


अब सवाल है कि क्या प्रशासन दुकान आवंटन की सूची की जांच करेगा? क्या कथित वसूली, बिजली शुल्क, लाइसेंस के नाम पर ली जा रही रकम और प्राइम लोकेशन वाली दुकान के मामले की पड़ताल होगी?


एसडीएम का संतोषजनक जवाब नहीं मिलना आरोपों का प्रमाण नहीं है, लेकिन मामले में स्पष्ट और दस्तावेज-आधारित जवाब की जरूरत जरूर है।


प्रशासन और कमेटी से सीधे सवाल


- करीब 400 दुकानों के आवंटन के बावजूद लगभग 150 दुकानें क्यों नहीं लगतीं?

- दुकानदारों को पक्के बिल की जगह सादे कागज पर हिसाब देने के आरोपों की जांच कौन करेगा?

- पांच से सात दिन की बिजली के ₹7,750 किस आधार पर लिए जाने का आरोप है?

- लाइसेंस के नाम पर ₹1,200 लेने का अधिकृत आधार क्या है?

- प्राइम लोकेशन वाली दुकान दूसरे व्यक्ति को दिए जाने के आरोप की जांच कब होगी?

- कमेटी के आर्थिक लेन-देन का ऑडिट कराया जाएगा या नहीं?

- कमेटी सदस्यों और दुकानदारों की शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है?


द एक्सपोज एक्सप्रेस की मांग—हो निष्पक्ष जांच


ग्वालियर का आतिशबाजी मेला व्यापार, सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा आयोजन है। दुकानदारों को नियमों के तहत कारोबार करने और अपने भुगतान का उचित हिसाब पाने का अधिकार है।


पंकज जायसवाल, अन्य कमेटी सदस्यों और दुकानदारों के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दुकान आवंटन की सूची, प्राइम लोकेशन के रिकॉर्ड, भुगतान के दस्तावेज, बिजली शुल्क और लाइसेंस संबंधी नियमों की जांच से ही वास्तविक स्थिति सामने आएगी।


एडवोकेट हरीश दीवान को भी आरोपों पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। जिला प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि जांच कब और किस स्तर पर होगी।


**सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, उस व्यवस्था का है जहां दुकान आवंटन से लेकर हर भुगतान तक पारदर्शिता होनी चाहिए।**


**द एक्सपोज एक्सप्रेस—सवाल वही, जो व्यवस्था को जवाब देने पर मजबूर करें।**

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