प्रशासनिक अमले की मदद करने गए प्रशांत को बदले में मिली मौत
आज मन भारी है। आँखें एक ऐसी तस्वीर पर टिक गई हैं जिसे देखकर भीतर तक कुछ टूट जाता है। एक मुस्कुराता हुआ नौजवान चेहरा... नाम- प्रशांत गौड़। उम्र? बस ज़िंदगी की दहलीज पर कदम ही रखा था। आने वाली 19 जून को सिर पर सेहरा सजने वाला था। घर में खुशियों के गीत गाए जा रहे थे, शादी के निमंत्रण पत्र बांटे जा रहे थे, और माँ-बाप अपनी आँखों में होने वाली बहू के स्वागत के सपने संजोए बैठे थे।
लेकिन किसे पता था कि ठीक 12 दिन पहले, नियति और प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही मिलकर इस घर के इकलौते चिराग को हमेशा-हमेशा के लिए बुझा देगी।
जब सहयोग की कीमत जान देकर चुकानी पड़े
घटना मध्य प्रदेश के मेहगांव की है। तारीख थी 20 मई। प्रशांत कोई अपने निजी काम से नहीं निकला था। वह तो वहां मौजूद प्रशासनिक अमले (सरकारी टीम) की मदद कर रहा था, जो खेत की नाप-जोख करने आई थी। एक आम नागरिक का फर्ज निभाते हुए प्रशांत प्रशासनिक अधिकारियों का सहयोग कर रहा था।
लेकिन हमारी व्यवस्था की रीढ़ इतनी खोखली हो चुकी है कि वहां सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं थे। खुले पड़े लाइव तारों या करंट की चपेट में आने से प्रशांत बुरी तरह झुलस गया।
सवाल यह उठता है: जब सरकारी अमला ज़मीन नापने जाता है, तो क्या उन्हें आस-पास फैले मौत के इन जालों (बिजली के खुले तारों) का अंदाजा नहीं होता? एक नौजवान व्यवस्था पर भरोसा करके आगे बढ़ता है और बदले में उसे मिलती है मौत की तड़प?
दिल्ली के अस्पताल में टूटी आखिरी सांस
हादसे के बाद प्रशांत को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, दिन-रात एक कर दिए। परिवार के लोग हर मिनट भगवान से उसकी सलामती की दुआ मांग रहे थे कि शायद कोई चमत्कार हो जाए, शायद उनका बेटा उठ खड़ा हो और घोड़ी चढ़कर अपनी दुल्हनिया लेने जाए।
लेकिन शनिवार, 7 जून को दिल्ली के एक अस्पताल में इलाज के दौरान प्रशांत ने दम तोड़ दिया। वह जिंदगी की जंग हार गया, या यूं कहें कि हमारी लचर व्यवस्था ने उसे हरा दिया।
मुआवजे का मरहम और सुलगते सवाल
हादसे की खबर फैलते ही इलाके में मातम पसर गया है। आदि गौड़ ब्राह्मण समाज सहित पूरा क्षेत्र इस असमय मृत्यु से स्तब्ध है। नेता और अधिकारी हमेशा की तरह मौके पर पहुंचे हैं। मेहगांव तहसीलदार ने पीड़ित परिवार को सांत्वना दी है और लगभग 4 लाख रुपये की सहायता राशि का आश्वासन दिया है। साथ ही दोषियों पर सख्त कार्रवाई की बात कही है।
लेकिन क्या 4 लाख रुपये उस बूढ़े बाप के बुढ़ापे की लाठी लौटा सकते हैं?
क्या यह मुआवजा उस माँ की सूनी गोद को दोबारा भर सकता है?
क्या चंद रुपयों का यह सरकारी मरहम उस होने वाली दुल्हन के आंसुओं की कीमत चुका सकता है, जिसके जीवन में आने से पहले ही सब कुछ उजाड़ हो गया?
शादी की शहनाइयों की गूंज सुनने का इंतजार कर रहे इस घर में अब सिर्फ चीखें और सन्नाटा है। इस दुखद घड़ी में हमारी संवेदनाएं प्रशांत के परिवार के साथ हैं। लेकिन संवेदनाओं से इतर, यह देश और यह समाज कब तक ऐसी लापरवाहियों की कीमत अपने नौजवानों की जान देकर चुकाता रहेगा? यह सवाल जस का तस खड़ा है।
देखते रहिए, सोचते रहिए।
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