- अदालत ने तो आशियाना चुना था साहब, मासूम को क्या पता था कि आगे कसाईखाना है
ग्वालियर। 07/06/2025
रिश्ते जब अपनी मर्यादा भूलकर हवस की चौखट पर दम तोड़ने लगें, तो समझ लीजिए कि समाज गहरे वेंटिलेटर पर है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर से एक ऐसी ही झकझोर देने वाली, रूह को कंपा देने वाली और रिश्तों के मुखौटे को उतार फेंकने वाली खबर आई है। एक पोती, जो अपने दादा के साए में खुद को महफूज़ समझ रही थी, उसे क्या पता था कि वही बुज़ुर्ग साया एक दिन उसके लिए सबसे बड़ा खौफ बन जाएगा।
अदालत का फैसला और कस्टडी का क्रूर सच
कहानी शुरू होती है साल 2012 से। एक शादी होती है, दो साल बाद एक मासूम सी किलकारी गूंजती है। लेकिन आपसी विवाद के चलते अक्टूबर 2023 में अदालत दोनों के रास्ते जुदा कर देती है। कानून अपनी तय प्रक्रिया के तहत 12 साल की मासूम बेटी की कस्टडी उसके पिता को सौंप देता है। पिता ग्वालियर का एक व्यापारी है। घर में पिता हैं, दादी हैं और वो 60 साल के दादा हैं, जिन्हें समाज में आदर की निगाह से देखा जाता है। कानून को लगा कि बेटी अपने पिता के घर सुरक्षित रहेगी, लेकिन किसे पता था कि उसी चारदीवारी के भीतर एक मासूम का बचपन हर रोज़ कत्ल हो रहा था।
शराब, स्क्रीन और चार महीने का नरक
बीते चार महीनों से उस घर में जो कुछ चल रहा था, वो किसी नरक से कम नहीं था। आरोप है कि 60 साल का वह कलयुगी दादा शराब के नशे में धुत होकर अपनी ही 12 साल की पोती को नींद से जगाता था। उसे जबरन अपने पास सुलाता, गोद में बिठाता और अश्लील हरकतें करता।
इतना ही नहीं, वह बुजुर्ग अपने मोबाइल पर मासूम को गंदी फिल्में दिखाता और कहता— 'यह सब सीखो, तुम बड़ी हो रही हो।'
सोचिए, जिस उम्र में बच्चों के हाथों में खिलौने या किताबें होनी चाहिए, वहां एक दादा अपनी पोती के ज़ेहन में अश्लीलता का ज़हर घोल रहा था। जब उस मासूम ने इस घिनौने कृत्य का विरोध किया, तो उसे जान से मारने की धमकी दी गई। खौफ का आलम यह था कि वह बच्ची चार महीने तक अंदर ही अंदर घुटती रही, रोती रही, लेकिन किसी से कुछ कह न सकी।
सूरत की उड़ान और टूटता हुआ सब्र का बांध
कहते हैं न कि ज़ुल्म की एक मियाद होती है। मार्च के महीने में जब स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियां हुईं, तो बच्ची की मां—जो गुजरात के सूरत में एक एस्ट्रोलॉजर हैं—वह ग्वालियर आती हैं और बेटी को अपने साथ फ्लाइट से सूरत ले जाती हैं।
चारदीवारी के उस खौफनाक माहौल से दूर, जब मासूम को अपनी मां का आंचल मिला, तो उसके सब्र का बांध टूट गया। तीन दिनों तक वह सहमी रही और आखिरकार रोते-रोते उसने मां के सामने अपनी ज़िंदगी का वो सबसे काला सच उगल दिया। सच सुनते ही मां के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस बेटी को उसने सुरक्षित समझकर छोड़ा था, वह अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी।
कानून की चौखट और फरार 'दरिंदा'
एक मां का कलेजा कांप उठा। वह बिना वक्त गंवाए सूरत के पुलिस थाने पहुंची। चूंकि मामला ग्वालियर का था, इसलिए सूरत पुलिस ने 'जीरो पर एफआईआर' दर्ज कर केस डायरी ग्वालियर के जनकगंज थाने भेज दी। ग्वालियर पुलिस ने भी रविवार को मामला दर्ज कर लिया है।
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) जयराज कुबेर का कहना है कि मामला दर्ज कर लिया गया है और आरोपी की तलाश की जा रही है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि वो आरोपी—वो दादा—फिलहाल फरार है।
सवाल ये भी है...
कि हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं? जहां अदालतें कस्टडी तो तय कर देती हैं, लेकिन बच्चों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? जब घर के भीतर ही रक्षक भक्षक बन जाएं, तो एक मासूम अपनी सुरक्षा की गुहार लेकर आख़िर किसके पास जाए? ग्वालियर की यह घटना सिर्फ एक अपराध नहीं है, यह हमारे नैतिक पतन का वो दस्तावेज़ है, जिसे पढ़कर हर संवेदनशील इंसान का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए।

