जब सुरक्षा की दीवार ही मौत का कारण बन जाए
गुड़ा-गुड़ी का नाका स्थित मुक्तिधाम के पास रिटेनिंग वॉल गिरने से एक महिला की मौत हो गई और दो लोग घायल हो गए। हादसे के बाद प्रशासन ने त्वरित राहत का दावा करते हुए प्रभावितों को रेडक्रॉस के माध्यम से 10-10 हजार रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा कर दी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या आम आदमी की जान और उसकी पीड़ा की कीमत महज 10 हजार रुपये है?
जिस दीवार को लोगों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, वही उनकी मौत और चोट का कारण बन गई। एक परिवार ने अपना सदस्य खो दिया, दो लोग अस्पताल में जिंदगी और दर्द से जूझ रहे हैं, और प्रशासन की ओर से राहत के नाम पर 10-10 हजार रुपये की सहायता दी जा रही है। यह राशि संवेदना का प्रतीक हो सकती है, लेकिन किसी परिवार के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती। इसलिए लोगों के बीच चर्चा केवल सहायता राशि की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जो हादसों के बाद जागती है।
देश के अधिकांश शहरों में अब यह एक सामान्य परंपरा बनती जा रही है। कोई दीवार गिरती है, कोई पुल ढहता है, कोई सड़क धंसती है या फिर बारिश में जलभराव लोगों की जान पर बन आता है। हादसा होते ही अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं, जांच समिति गठित हो जाती है, कारण बताओ नोटिस जारी हो जाते हैं और राहत राशि की घोषणा कर दी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि अगर यही सतर्कता और जवाबदेही पहले दिखाई जाती, तो क्या ऐसे हादसे टाले नहीं जा सकते थे?
गुड़ा-गुड़ी का नाका की घटना में भी यही प्रश्न सबसे बड़ा है। यदि निर्माण कार्य में गुणवत्ता की कमी थी, यदि निगरानी में लापरवाही हुई थी, यदि संबंधित विभाग को संभावित खतरे की जानकारी थी, तो फिर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या किसी की जान जाने के बाद ही व्यवस्था की आंखें खुलेंगी? क्या जांच और नोटिस ही हर त्रासदी का अंतिम समाधान हैं?
वास्तविकता यह है कि अधिकांश हादसे अचानक नहीं होते। उनके संकेत पहले से मौजूद होते हैं। निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं, नागरिक शिकायतें करते हैं, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं, लेकिन कार्रवाई अक्सर तब होती है जब कोई बड़ा नुकसान हो चुका होता है। इसके बाद जिम्मेदारी तय करने के बजाय फाइलें चलती हैं और कुछ समय बाद मामला लोगों की यादों से ओझल हो जाता है।
आज शहर यह जानना चाहता है कि इस हादसे के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या केवल नोटिस जारी कर देने से जवाबदेही तय हो जाएगी? क्या उस लापरवाही पर भी कार्रवाई होगी जिसकी वजह से एक महिला की जान चली गई? क्योंकि जब सरकारी निर्माण ढहता है तो उसके नीचे सिर्फ सीमेंट और पत्थर नहीं गिरते, बल्कि किसी का घर उजड़ता है, किसी परिवार का सहारा छिनता है और किसी की पूरी दुनिया बदल जाती है।
प्रशासन का दायित्व केवल हादसे के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि हादसे को होने से पहले रोकना है। एक संवेदनशील व्यवस्था वही है जो जांच समितियों से ज्यादा रोकथाम की व्यवस्था मजबूत करे। क्योंकि किसी भी दुर्घटना के बाद दिया गया मुआवजा या राहत राशि जीवन की भरपाई नहीं कर सकती।
गुड़ा-गुड़ी का नाका की यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था के सामने खड़ा एक सवाल है—आखिर प्रशासन हर हादसे के बाद ही क्यों जागता है, पहले क्यों नहीं?
— डॉ. स्वयं प्रकाश गौड़

