उखड़ी सड़कें, सुरंगनुमा गड्ढे और जलभराव... हर बारिश में सामने आता वही सवाल—आखिर शहर की सड़कों की जिम्मेदारी किसकी?
ग्वालियर। बारिश कोई नई घटना नहीं है। मानसून हर साल आता है, बादल बरसते हैं और शहर को पानी से जूझना पड़ता है। लेकिन ग्वालियर में बारिश के बाद जो तस्वीर सामने आती है, वह सिर्फ मौसम की मार नहीं, बल्कि व्यवस्थाओं की असलियत का आईना बन जाती है।
कहीं सड़कें उखड़ चुकी हैं, कहीं सड़क के बीचों-बीच बने गड्ढे इतने गहरे हो गए हैं कि वाहन चालकों के लिए हादसे का खतरा लगातार बना हुआ है। कई जगह हालात ऐसे हैं कि सड़क कम और सुरंगनुमा गड्ढे ज्यादा नजर आते हैं। जलभराव ने अलग से लोगों की मुश्किल बढ़ा दी है। सड़क और नाली का फर्क तक समझ में नहीं आता।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नगर निगम प्रशासन हर साल बारिश आने का इंतजार करता है, ताकि उसके बाद गड्ढे भरे जाएं और जलभराव से निपटने की कवायद शुरू की जाए?
अगर सड़क निर्माण में गुणवत्ता का ध्यान रखा गया था, तो पहली तेज बारिश में सड़कें क्यों उखड़ने लगती हैं? अगर नालियों और ड्रेनेज सिस्टम की व्यवस्था पर्याप्त है, तो बारिश के पानी को निकलने में घंटों क्यों लगते हैं? और अगर शहर के विकास पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तो बारिश के बाद नागरिकों को उसी पुराने जलभराव, गड्ढों और टूटी सड़कों का सामना क्यों करना पड़ता है?
बारिश ने सिर्फ सड़कें नहीं तोड़ीं, बल्कि व्यवस्थाओं की कई परतें भी उधेड़ दी हैं।
सड़क बनती है, कुछ समय बाद खुद जाती है, फिर मरम्मत होती है और अगली बारिश में फिर वही कहानी सामने आ जाती है। यह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा? जनता सिर्फ सड़क नहीं मांग रही, वह टिकाऊ सड़क, सुरक्षित आवागमन और जवाबदेह व्यवस्था मांग रही है।
नगर निगम और संबंधित विभागों को अब बारिश के बाद होने वाली औपचारिक खानापूर्ति से आगे बढ़ना होगा। केवल गड्ढों में मलबा डालकर तस्वीर खिंचवा देना समाधान नहीं है। जरूरत है यह पता लगाने की कि सड़क क्यों टूटी, निर्माण में क्या खामी थी, जिम्मेदारी किसकी थी और उस पर कार्रवाई क्या हुई?
क्योंकि हर गड्ढा सिर्फ सड़क पर नहीं होता—कभी-कभी वह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है।
ग्वालियर को स्मार्ट और विकसित शहर बनाने के दावे तभी सार्थक होंगे, जब आम नागरिक बारिश के दिनों में अपनी जान जोखिम में डालकर सड़क पर निकलने को मजबूर न हो।
अब वक्त है कि नगर निगम प्रशासन बारिश को बहाना नहीं, चेतावनी माने। गड्ढों की गहराई नापने से ज्यादा जरूरी है उन गड्ढों के पीछे की जवाबदेही तय करना।
सवाल सीधा है—बारिश हर साल होगी, लेकिन क्या ग्वालियर की सड़कें हर साल यूं ही टूटती रहेंगी?
📝 डॉ. स्वयं प्रकाश गौड़।
The Xpose Express
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